Category Archives: Hindi Kavita * हिन्दी कविता

Here are some of my Hindi poems for you all. Hope you would like them.

मेरी लिखी कुछ हिन्दी कविताएं यहां पर प्रस्तुत है. आशा है आप सभी को ये पसंद आएगी. धन्यवाद!

मां सच्ची या सच्चा मैं हूं?

मेरी मां ने कहा था बेटे छोटा है तूं

रोज़ ये बाता सोच सोच मैं खुद से पुछूं…

मां सच्ची या सच्चा मैं हूं?

पहले तो ये जाना भी ना मैया है क्या

चिल्लाती भी ईतराती ये औरत है क्या

खाना भी देती थी फिर भी गुस्सा करती

और अकेले जा के रोती करती है क्या?

रिश्ता रस्ता रोज़ सीखाती चूप रह के वो

कितना बोला उसने मैंने सुना भी है क्या?

एक ये छोटी बात है बडी़ कैसे कह दूं?

रोज़ ये बाता सोच सोच मैं खुद से पुछूं…

मां सच्ची या सच्चा मैं हूं?

गद्दा बिस्तर थाली कपडें सब कुछ मैला

स्कूल से आ के फैंक दिया था कैसे थैला

सब कुछ सब दिन ठीक रहा पर ऐसे जैसे

सब कुछ मैंने किया ना उसने देखा जैसे

और अगर कोई कह दे कुछ भी मेरे बारे

वो संभाले हंस के कर दे न्यारे न्यारे

पता नहि था पता चलेगा एक दिन ही यूं

रोज़ ये बाता सोच सोच मैं खुद से पुछूं…

मां सच्ची या सच्चा मैं हूं?

– संजय वि. शाह ‘शर्मिल’

छेडो़ न कान मोहे

(कॄष्णपर्व नाटक का गीत)

छेडो़ न कान मोहे नटख़ट गोपाल तोहे

बंसी की सों तोहे बंसी की सों

गोरी दीवानी मोरी राधा रंगीली थोरी

सुनियो मोरी ना दीजो

बंसी की सों मोहे बंसी की सों…

आवे तूं पास जावे दे दई के प्यास करे

नैनन ऊदास मोरे नैनन ऊदास

फिर जा के मिल जावे गोपीओं के साथ

नाहि सोचे क्या मोरे मनवा की आस

मोरे मनवा की आस…


मनवा जो तोरा है मोरा ही मनवा है

बसीयो वही ना दीजो बंसी की सों

बंसी की सों मोहे बंसी की सों…

अंबर ना बनियो के बादल ही रहियो जी

मंडरा के मोह मुजे़ जईयो ज्यां चाह तोरी

जईयो ज्यां चाह

ना बरसूं तुज़ पे जो खुद ही जो तरसूं तो

क्या कान्हा राधा री होगी ये चाह

कहे होगी ये चाह?

ये तेरे रंग सोहे मनवा को देख मोहे

खेलेंगे रास छोड़ बंसी की सों

छेडो़ गोपाल छोड़ बंसी की सों

बंसी की सों छोड़ बंसी की सों

– संजय वि. शाह ‘शर्मिल’

(This song is basically about a conversation between Radha and Krishna in the play KRISHNAPARVA. Sudha Chandran plays RADHA in the play and the song)

मां


सोचो ये दुनिया क्या होती
अगर भगवान के जैसी मां न होती?
उसके हाथों की लकीरें
जिम्मेदारीओं का बोज़ ढहकर
न जाने कब मिट जाती है
पर ऐसा करते करते वो
संतान के हाथों की लकीरों को
सुख्-समॄद्धि से भर देती है…
अपनी जवानी खोकर मां
हमको बचपन देती है
खुद बुढी हो जाती है हमको
खुशहाल जवानी देती है
और एक मकान को घर बनाकर
खुद उस घर के एक कोने में
बिना कोई फरियाद किये
बस बैठे रहती है
कुछ ऐसे जैसे
मंदिर में भगवान की मूरत रहती है…

Photo courtesy – http://colorfulideas.in/wp-content/uploads/2009/08/mother_child_79.jpg)

प्रार्थना सिद्दिविनायक की…

पाप छूटे और चिंता छूटे,

मन में सच्ची करुणा उमटे

जीवन को नयी दिशा मिले,

जब तेरे दर्शन करते है…

चलो सिद्धिविनायक चलते है

बाप्पा के दर्शन करते है…

सिद्धिविनायक, सिद्धिविनायक, सिद्धिविनायक देवा

करूं करूं मैं करूं करूं मैं

हर दम तेरी सेवा… (२)

साफ़ करो दिल माथा टेको

गणराया की आंखे़ देखो

दादर में हर दर्द की दवा

जो कहे दो जय गणेश देवा

शरण में जाओ कहो उसे हम

जीवन अर्पण करते है

चलो सिद्धिविनायक चलते है

बाप्पा के दर्शन करते है…

सिद्धिविनायक, सिद्धिविनायक, सिद्धिविनायक देवा

करूं करूं मैं करूं करूं मैं

हर दम तेरी सेवा… (२)
– संजय वि. शाह ‘शर्मिल’