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सोचा भी है कि क्या सोचना है?

संजय वि. शाह

नाक और दिमाग में कुछ कमाल की साम्यताएं है. दोनों बहूत ही महत्त्वपूर्ण अंग है लेकिन दोनों को मेनेज करने को न्यूनतम कष्ट उठाना पडता है. जागते रहो या सो जाओ, नाक सांसे लेते ही रहेगा. चाहो या ना चाहो, दिमाग कुछ ना कुछ सोचते ही रहेगा. सोचने में दिमाग का आखिर जाता भी क्या है? अगर किसीका कुछ जाता है तो वो तो सोचने वाले का जाता है!

दिमाग को नाक के पास काफी कुछ सीखने जैसा है. नाक को आखिर कहां नाक होता ही है कि वो जगह या किस्म देखकर सांस ले? नाक इतना मनमौजी है कि वो तो सांसे लेते ही जाता है. हवा स्वच्छ हो हा दूषित हो, देशी हो या विदेशी, किसे परवा है? नाक स्वार्थ का एक परम प्रतीक है. तभी तो उसमें जीवन को मुस्ताक होकर, जिसका वो होता है उसके लिये अखंडित काम करने की क्षमता है. दिमाग भी अगर ऐसा ही होता तो जीवन में नाट्यात्मक परिवर्तन आ सकते है. क्या विचार है आपका इस विचार के बारे में?

जरा सोचिए, दिमाग तो अपना ही होता है, लेकिन उसमें विचार दूसरों के बारे में ही चलते रहते है!विचार भी ज्यादातर स्वार्थ के, द्वेष के, बूरी हकरतों के और किसीका अहित करने के. प्रेम, करुणा और भलाई के विचार तो कम ही जन्म लेते है दिमाग में. एक मित्र दूसरे से कहता है, “एक साल में आयुष के जैसी ही कार लेनी है,” तो एक व्यापारी दूसरे से कहता है, “एक साल में मुजे मेरे व्यापार को मेरे प्रतियोगी से दूगना कर दिखाना है.” अगर यह दिमाग की बदसलूकी नहि है तो और क्या है? अपनी अवस्था संतुष्ट नहि रहना और दूसरों का स्थान देखकर स्वयं की जगह के बारे मे पीडित होते रहना वो अयोग्य विचार नहि है तो और क्या है? मछली और मगरमच्छ दोनों ही पानी में रहते है लेकि मछली तो कभी मगरमच्छ बनने के बारे में सोचती भी नहि, तो इन्सान क क्यूं वो ही बनन होता है जो दूसरे होते है?

विचार करने के पैसे नहि लगते लेकिन बूरा, अर्थहिन सोचने की बडी कीमत चूकानी पडती है. इतनी बडी कीमत कि जो जीवन की दिशा और दशा दोनों को गल्त राह पर ले जा सकती है. इसीलिये क्या सोचना है, कब सोचना है, कितना सोचना है और किसके बारे में सोचना है वो अपने आप में बेहद महत्त्वपूर्ण विचार है. हमारे हर विचार का सीधा सम्बन्ध हमारी नीजी जीवन से, जीवन के लक्ष्य से होना ही चाहिए. सांस का कार्य ऊम्र में वृद्धि करने का है तो विचार का कार्य है जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि करने का है. विचार सुख, संतोष और सद्दकार्य की बैन्क बने और ना कि पीडा की टॅन्क उसकी चौकसी सदैव रखनी ही चाहिए. नाक में कलूषित हवा जाएगी तो वो त्वरित प्रतिक्रिया दिखाएगा. दिमाग में गलत विचार आएगा तो वो देर-सवेर ही सही लेकिन बहूत गंभीर प्रतिक्रिया दिखाएगा. अब कहिए, आप कें मन में क्या विचार चल रहा है?

इस बात पर गंभीरतापूर्वक विचार अवश्य करना पडेगा. बुद्ध बनना है या बुद्धु बनना है, पसंद आप ही को करना है. अच्छा, आदर्श इन्सान बनना है तो अच्छा सोचिए, अच्छे के लिये सोचिए. कूएं में कोई पत्थर फेंके तो भी कुंआ पानी ही देता सामने कभी पत्थर नहि ऊछालता. हमे भी अपने सुख के लिये और अच्छे के लिये हर पत्थर का जवाब अच्छाई से ही देना है. विचार में छुपे भेद से बढकर कोई शास्त्र या वेद नहि है. इस वेद को स्मज पाओगे तो उन्नति होगी, वो भी सर्वश्रेष्ठ.

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जीवन सार्थक और संपूर्ण होगा! (Hindi Rankaar)

रणकार

संजय वि. शाह

नदी कभी अपना पानी पीती नहि है. ना कभी कोई वृक्ष अपने ही उगाए फल खाता है. बारिश जो दाने उगाती है उसे कभी मांगती नहि. ये सब वो दानवीर है जो सिर्फ देना जानते है और बदले में कुछ पाने की आशा रखते नहि है. सच्चे धनवान भी वो ही लोग है जिनका पैसा खुद के भोगविलास के लिये नहि पर दूसरों के कल्याण के लिये खर्च करे. आखिर सबकुछ खुद के लिये किया भी तो जीवन में क्या किया?

बचपन की बात लेते है. दो निर्दोष बालक कईं बार प्रगाढ मित्र होते है. लेकिन दो पुख्त लोगों के बीच में नि:स्वार्थ और निष्कपट मित्रता जल्दी से नहि होती. मानो कि बुद्धि आने के बाद उसमें कईं बदी आ जाती है. दोस्ती का नाम ही है बिना किसी मतलब के एक-दूसरे के होना. लेकिन इन्सान का स्वभाव ही ऐसा है कि उसे बिना कुछ पाए कुछ देना अच्छा नहि लगता. ये बात गलत ही नहि पर समाज के लिये, रिश्तों के लिये भी बूरी है.


शिक्षक क्या है? उसे जो मानधन मिलता है उसकी तुलना में वो विद्यार्थीयों को जो ज्ञान बांटता है उसका मूल्य अनेक गुना ज्यादा होता है. शिक्षक भले ही अपना कार्य करता है लेकिन साथ में वो परमार्थ भी कर ही देता है. आज की दुनिया में लेकिन ऐसे बहूत कम व्यवसाय बचे है, ऐसे बहूत कम कर्म बचे है जो मानवता सीखाने के साथ साथ जीने की राह भी हमे दिखाए. कोई बात नहि. उन नदीयों से, पेड-पौधों से, बादलों से हम चाहे तो सीख सकते है.

संत कबीरजी ने काफी सुंदर बात कही है. उन्होने कहा है कि जिस तरह नाव में पानी भर जाए उसके पहले उसे बाहर फेंक देना चाहिए, उसी तरह घर में धन भर जाए उसके पहले उसे बांट देना चाहिए. बांटोगे तो कुछ ऐसा पाओगे जो सिर्फ भाग्यशाली लोगों को मिलता है. और वो है मानसिक सुख, परम शांति और जीवन में कुछ असाधारण करने का संतोष.

मित्रों के साथ, परिवारजनो के साथ, सहकर्मचारी और साथी विद्यार्थीओं के साथ, प्रत्येक संबंध में, संजोग में और समय में मन में किसी के लिये कुछ करने की इच्छा रहनी ही चाहिए. किसी के लिये कुछ भले कार्य करने ही चाहिए, और उसके बदले में कुछ पाने की इच्छा भी नहि करनी चाहिए. विश्व के सबसे श्रीमंत लोगों में जिनका स्थान है वैसे बिल गॅट्स और वॉरन बफॅ ने भी अपनी अपार संपत्ति का सबसे बडा हिस्सा समाजसेवा और सदकार्य में लगा दिया है. जिस समाज से उन्होने धन उपार्जन किया उसी पर उसका अधिकार है ये भावना को दोनो ने उजागर किया है. हमे भी यथा शक्ति ये भाव रखना ही है. आखिर तभी तो इश्वर का दिया जीवन सार्थक और संपूर्ण होगा!
(photo courtesy: http://blogs.mysanantonio.com/weblogs/althealth/Spotlight.JPG)

बुद्धि का प्रयोग

रणकार

ऐसा माना जाता है कि बुद्धि का प्रयोग करने से हर समस्या का निवारण मिल जाता है, मिल सकता है. पर ये बात शत प्रतिशत सच नहि है. कभी कभी ऐसा भी होता है कि बुद्धि का प्रयोग करने से समस्या का निवारण नहि भी मिल पाता है. मान लिजिए कि ट्रॅन में आप प्रवास कर रहे हो और किसी कारणवश ट्रॅन देरी से चल रही है, तो जल्दी से कहीं पहूंचने के लिये बुद्धि का कितना भी प्रयोग किया तो क्या फायदा? बुद्धि का प्रयोग करने से ना ही आपको सुपर मेन जैसी शक्ति पमिल जाएगी और ना ही हमारे देश की ट्रॅन अचानक ही जापान की बूलॅट ट्रॅन की तरह तेज़ रफ्तार से दौड़ने लगेगी. ईसीलिये तो, कुछ कुछ स्थिति ऐसी होती है जहां सचमुच बुद्धि का प्रयोग ना ही करे तो अच्छा रहता है. द्रष्टांत के तौर पर, यदि कोई व्यापारी परिवार के साथ कहीं घूमने-फिरने जाए, वो भी बडी़ मुश्किल से कुछ दिनो का समय निकालकर, तो वहां भी उसके मनोजगत पर अगर व्यापार का ही टॅन्शन छाया रहे तो क्या फायदा? घूमने-फिरने गये तो दीमाग पर जो़र डालने की नहि, उसे शांति देने की आवश्यकता होती है. दीमाग नामकी मशीन भी कभी कभी परिवर्तन नाम के मॅन्टेनन्स की अपेक्षा करता है. जब उसका उपयोग करने का समय आये तब उसे रॉकॅट की तरह चलाने के लिये कुछ सीधे-सादे नियमों का पालन करना ज़रूरी है. ऐसे नियमों का जो पालन नहि करते है वो बुद्धिशाली भी समय के चलते साधारण विचारशक्ति का भोग बन जाते है. और मूर्ख-साधारण लगने वाले लोग सही समय पर, सही विचार करके चमत्कार कर दिखा सके है. ये सच ही है कि दीमग को चलाने से उसे समज़ने पर ध्यान देना ज्यादा आवश्यक है. ईस कला को आत्मसात् करना अनिवार्य है. जिस तरह रात को जागने का और दिन में सोने का विचार अधिकतर लोग नहि करते उसी तरह हर बात में विचारशील होना पड़ता है. बस, ये बात पर गौर करके दीमाग को ऑन और ऑफ्फ करने का काम करते जाईए, बहूत लाभ होगा.
– संजय वि. शाह ‘शर्मिल’

विरोधाभास

रणकार

कैसा विरोधाभास प्रवर्तमान है ईस जगत में! कम्प्युटर के लिये जो चाहिए वो सीडी़ की कीमत सिर्फ दस रूपये. रॅस्टॉरां में जो मिलता है वो ज्युस का एक ग्लास चालीस रूपये का! महंगाई ने टॅक्नॉलोजी को बेहद सस्ता कर दिया है और एक वक्त के खाने को आश्चर्यचकित कर दे उतना महंगा. आम आदमी की हालत ईस विरोधाभास ने बहूत ही विकट कर डा़ली है. फिर भी सब को जीवन जीना तो पडे़गा ही और गाडी़ आगे भी ले जानी पडे़गी. हां, ईस काम को अच्छी तरह करने के लिए ज़रा सी समज़दारी दिखाना भी महत्त्वपूर्ण है. उदाहरण के तौर पर, अगर हमारा अखबार उसके दाम में सिर्फ आठ आना- एक रूपया बढा़ देता है तो हम चिल्लाने लगते है. लेकिन उससे एकदम विपरित, घर में डे़ढ सौ रूपये में लिया गया और अच्छे से चल रहा कॅबल कनेक्शन हमे यूं ही बूरा लगने लगता है और हम दिखावे के पीछे, दूसरो को देखकर डी़टीएच सर्विस ले लेते है. ऐसे खुश होकर कि मानो कॅबल कनेक्शन में तो कभी कोई चॅनल दिखता ही नहि था! लक्झरी, फॅसिलिटी और स्टाईल के नाम पर लोग न जाने कितना रूपया खर्च कर बैठते है. दूर की सोचे बिना ही. दिखावे के लिये लोग बीस-पच्चीस हजा़र का मॉबाईल हॅन्डसॅट चुटकी बजाकर खरीद लेते है, लेकिन घर पर अगर संतान दो-पांचसौ रूपये का खिलौना मांगेगा तो लोगो को गुस्सा आ जाता है. उस महंगे मॉबाईल में जो फॅसिलिटी दी गई है उसमें से सचमुच में कितनी काम आती है वो तो भगवान ही जाने. ऐसे ही कितकितने विरोधाभास समाज के हर पहलू में, हर वर्ग में और हर कार्य में फैल चूके है. जीवन में भी. ईन विरोधाभास से कभी छूटकारा पाओ, समज़दारी बरतो तो यह पता चलेगा कि महंगाई के ईस कठीन युग में भी हमारी जेब में लडने की बहूत ताकत है. समय बेशक कठीन है लेकिन कुछ नासमजी़ से अलिप्त रहे, संयम रखे तो ईस समय का सामना करना आसान हो जाएगा. एक दिन सुबह से लेकर रात तक सोचना ईस छोटी सी बात पर. शायद खुद की ही गलतीओं पर हंसना आएगा और उन्हे सुधारने का द्रढ मनोबल भी उसी से प्राप्त होगा.

– संजय वि. शाह ‘शर्मिल’